Goa Ka Isai Nyayadhikaran(Goa Inquisition)

Anant Kakaba Priolkar, Translator: Shapur Navsari, Editor: Vinay Krishna Chaturvedi Tufail

ISBN: 9788198770226, 8198770224

Publisher: Akshaya Prakashan

Subject(s): History, Religion

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Title: Goa Ka Isai Nyayadhikaran(Goa Inquisition)

Author: Anant Kakaba Priolkar, Translator: Shapur Navsari, Editor: Vinay Krishna Chaturvedi Tufail

ISBN 13: 9788198770226

ISBN 10: 8198770224

Year: 2026

Language: Hindi

Pages etc.: 2026, xvi+264 pp., 22 cms.

Binding: Paperback

Publisher: Akshaya Prakashan

Subject(s): History, Religion

ईसाई न्यायाधिकरण, गैर-ईसाइयों तथा नव-ईसाइयों के प्रति क्रूरता के लिए कुख्यात रहे हैं, परंतु इन सबमें गोवा के ईसाई न्यायाधिकरण ने अमानवीयता की सारी हदें पार कर दी र्थी। दुर्भाग्यवश हिन्दू जाति में इतिहास लेखन की परम्परा नहीं है। इस कारण गोवा न्यायाधिकरण 1560 में स्थापित होने से लेकर 1812 में इसकी समाप्ति तक के विवरण के लिए हमें पुर्तगाली स्रोतों अन्य यूरोपीय स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है। पहली बार गोवा के इस कुख्यात ईसाई न्यायाधिकरण के विषय में लिखने का प्रयास स्वर्गीय अनंत काकबा प्रियोलकर ने 1961 में किया था। उनके स्रोत मुख्यतः पुर्तगाल के अभिलेख तथा कुछ प्रबुद्ध पुर्तगाली लेखक थे जो अपनी जाति के लोगों के कार्य से वास्तव में दुखी थे। 

यह पुस्तक अनंत काकबा जी की उसी पुस्तक "The Goa Inquisition" का हिन्दी रूपांतर है। गोवा के ईसाई न्यायाधिकरण के विषय में फ्रेंच दार्शनिक वोल्टेयर के शब्द उल्लेखनीय हैं: 

"गोवा का पुर्तगाली प्रशासन अपने ईसाई न्यायाधिकरण के लिए घृणित रूप से कुख्यात है। इस तरह की नृशंसता पुर्तगाल के व्यापारिक हितों के विपरीत तो है ही, वरन मानवता की मूल भावना के भी सर्वथा विपरीत है। पुर्तगाली भिक्षुओं ने हमें यह विश्वास दिलाने के लिए बहकाया कि भारतीय जनता शैतान की पूजा कर रही है, जबकि हकीकत यह है कि उन ईसाई भिक्षुओं ने अपने जघन्य कृत्यों के माध्यम से उस शैतान की सेवा की।" 

ऐसा नहीं है कि यह सब कुछ एक अपवाद था तथा ईसाई धर्म का इससे कुछ भी लेनादेना नहीं था। वोल्टेयर ईसाई धर्म के विषय में लिखते हैं: 

"............यह (ईसाई धर्म) अभी तक इस विश्व को संक्रमित करने वाले सभी धर्मो में सबसे अधिक विद्रूप, सबसे अधिक मूर्खतापूर्ण तथा सबसे अधिक रक्त-पिपासु है।" 

शत्रु बोध से वंचित भारतीयों के लिए यह अत्यंत उपयोगी पुस्तक है।

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